क्या कोई वर्षों से शासकीय भूमि पर कब्जा जमा लिया है तो क्या वो भूस्वामी हो सकता है क्या, माननीय उच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ का क्या आदेश है ????
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नहीं, भारतीय कानून के अनुसार, कोई व्यक्ति सरकारी (शासकीय) भूमि पर लंबे समय तक कब्जा करके उसका स्वामी नहीं बन सकता, ख
ासकर यदि वह भूमि सार्वजनिक उपयोग (जैसे सड़क, अस्पताल या अन्य पब्लिक यूटिलिटी) के लिए आरक्षित हो। लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 112 के तहत सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्जे (adverse possession) के लिए 30 वर्ष की अवधि आवश्यक है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स के फैसलों में यह स्पष्ट है कि सार्वजनिक उपयोग की सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्जा से कोई स्वामित्व अधिकार नहीं मिलता, क्योंकि ऐसी भूमि पब्लिक ट्रस्ट में होती है और इसे निजीकरण नहीं किया जा सकता।
छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस मुद्दे पर स्पष्ट आदेश दिए हैं। उदाहरण के लिए, ग्राम पंचायत जैमुरा बनाम निर्निधि (सेकंड अपील नंबर 179/2009, फैसला तिथि: 12 मार्च 2020) में जस्टिस संजय के. अग्रवाल ने फैसला सुनाया कि सरकारी भूमि जो घासभूमि या पब्लिक यूटिलिटी (जैसे प्राइमरी हेल्थ सेंटर) के लिए आरक्षित है, पर प्रतिकूल कब्जा से कोई टाइटल नहीं मिल सकता। कोर्ट ने कहा कि रेवेन्यू रिकॉर्ड्स के रिमार्क्स कॉलम में एंट्रीज का कोई कानूनी महत्व नहीं है, और वादी ने 30 वर्ष का निरंतर, शत्रुतापूर्ण कब्जा साबित नहीं किया। निचली अदालतों के फैसले पलट दिए गए, और सूट खारिज कर दिया गया।243269 इसी तरह, एक अन्य फैसले में हाई कोर्ट ने पुष्टि की कि अस्पताल या सड़क जैसी पब्लिक यूटिलिटी वाली सरकारी भूमि पर adverse possession का दावा नहीं चल सकता, और सुप्रीम कोर्ट के रविंदर कौर ग्रेवाल बनाम मंजीत कौर (2019) केस का हवाला देते हुए निचली अदालतों के आदेश रद्द किए।
माननीय सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख आदेश निम्नलिखित हैं:
Government of Kerala v. Joseph (2023): कोर्ट ने कहा कि "मात्र लंबे समय तक कब्जा रखने से प्रतिकूल कब्जे का अधिकार नहीं मिलता" (Mere possession over a property for a long period does not grant the right of adverse possession)। सरकारी भूमि पर दावे के लिए और भी सख्त जांच जरूरी है।
Shakeel Ahmad v. State of Uttar Pradesh (2024): सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी भूमि पर बसना या अनधिकृत निर्माण करना प्रतिकूल कब्जे से स्वामित्व नहीं देता। केवल कब्जा होना पर्याप्त नहीं; स्वामी बनने का स्पष्ट इरादा (animus possidendi) साबित करना जरूरी है।
Ravinder Kaur Grewal v. Manjit Kaur (2019): यह फैसला मुख्य रूप से निजी भूमि पर प्रतिकूल कब्जे के लिए है, जहां कोर्ट ने कहा कि प्रतिकूल कब्जे का दावा प्लेंटिफ (वादी) भी कर सकता है (sword के रूप में), न कि केवल डिफेंस (shield) के रूप में। लेकिन यह सामान्य सिद्धांत सरकारी भूमि पर लागू नहीं होता, क्योंकि अन्य फैसलों में सरकारी भूमि को अलग श्रेणी में रखा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार जोर दिया है कि सरकारी भूमि (जैसे ग्राम समाज, पब्लिक यूटिलिटी या आम उपयोग की भूमि) पर अवैध कब्जा कभी वैध नहीं होता, और सरकार को इसे जल्दी हटाने का निर्देश दिया है। यदि भूमि सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित है, तो प्रतिकूल कब्जे का दावा पूरी तरह असफल होता है।
माननीय न्यायालय का आदेश का पालन करना सबके लिए बंधनकारी हैं।
