राजिम {वफादार साथी }|राजिम (जिसे राजीव लोचन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है) छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिले में स्थित एक प्राचीन और बहुत महत्वपूर्ण तीर्थस्थल है। इसे छत्तीसगढ़ का प्रयाग कहा जाता है, क्योंकि यहां महानदी, पैरी नदी और सोंढुर नदी का पवित्र त्रिवेणी संगम है।
राजीव लोचन मंदिर का इतिहा
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निर्माण काल: मंदिर का निर्माण मुख्य रूप से 8वीं शताब्दी में माना जाता है। कुछ स्रोतों के अनुसार, यह नलवंशी (या सोमवंशी) राजा विलासतुंग के शासनकाल में बना था। पुरातात्विक प्रमाणों और शिलालेखों से यह 8वीं-9वीं शताब्दी का माना जाता है, हालांकि लोक मान्यताओं में इसे महाभारत काल (लगभग 5000 वर्ष पुराना) तक जोड़ा जाता है।
शिलालेख और पुरातात्विक महत्व: मंदिर में कलचुरी काल (11वीं-12वीं शताब्दी) के शिलालेख मिले हैं, जैसे कलचुरी संवत् 1816 (लगभग 1145 ई.) का अभिलेख, जो रतनपुर के कलचुरी नरेशों के सामंत जगतपाल द्वारा लिखवाया गया था। यह राजिम के प्राचीन नाम "राजमल" या "राजम" से जुड़ा है।
पौराणिक कथाएं:
सृष्टि की शुरुआत में भगवान विष्णु के नाभि से निकला कमल यहां गिरा था, इसलिए इसे कमलक्षेत्र या पद्मावती पुरी कहा जाता था।
एक कथा के अनुसार, गज-ग्राह युद्ध के बाद भगवान विष्णु ने राजा रत्नाकर को दर्शन दिए, जिसके बाद मंदिर का निर्माण हुआ। इसलिए इसे हरिहर क्षेत्र भी कहते हैं।
कुछ मान्यताओं में श्री राम ने वनवास काल में यहां कुलेश्वर महादेव की पूजा की थी।
प्राचीन काल में जगन्नाथ पुरी की यात्रा अधूरी मानी जाती थी जब तक राजीव लोचन के दर्शन न किए जाते।
मंदिर का महत्व
धार्मिक महत्व: मंदिर भगवान विष्णु के राजीव लोचन (कमल जैसी आंखों वाले) रूप को समर्पित है। गर्भगृह में काले पत्थर की चतुर्भुजी मूर्ति है, जिनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं। यह विष्णु के विभिन्न रूपों/अवतारों से जुड़ा है।
वास्तुकला: मंदिर नागर शैली का है, जिसमें आयताकार महामंडप, अंतराल, गर्भगृह और प्रदक्षिणापथ है। दीवारों पर यक्ष, कल्पलता, देवी-देवताओं की सुंदर नक्काशी है। यह चार कोनों में छोटे मंदिरों वाला प्रांगण है।
मेला और उत्सव: माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक राजिम कुंभ मेला (छत्तीसगढ़ का कुंभ) लगता है, जहां लाखों श्रद्धालु आते हैं। यह राजीव लोचन कुंभ मेला के नाम से प्रसिद्ध है और शिवरात्रि पर विशेष महत्व रखता है।
अन्य आकर्षण: पास में कुलेश्वर महादेव मंदिर (संगम के बीच में), राजेश्वर, जगन्नाथ आदि मंदिर हैं।
राजिम के श्री राजीव लोचन मंदिर के दर्शन से भक्तों को मुख्य रूप से आध्यात्मिक, मानसिक और धार्मिक लाभ मिलते हैं। यह मंदिर भगवान विष्णु के राजीव लोचन (कमल-नयन वाले) स्वरूप को समर्पित है, और लोक मान्यताओं, पुराणों तथा स्थानीय परंपराओं के अनुसार यहां दर्शन करने से कई फायदे होते हैं। ये लाभ मुख्यतः श्रद्धा और विश्वास पर आधारित हैं।
प्रमुख लाभ और मान्यताएं
चारों धाम की प्राप्ति का पुण्य: कई भक्तों और स्थानीय कथाओं के अनुसार, राजीव लोचन मंदिर के दर्शन से चारों धाम (बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम) के दर्शन का पुण्य मिलता है। खासकर जगन्नाथ पुरी की यात्रा अधूरी मानी जाती थी जब तक राजिम में दर्शन न किए जाते।
मनोकामनाओं की पूर्ति: भगवान विष्णु के इस स्वरूप के दर्शन से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विशेषकर सच्ची भक्ति से मांगे गए वरदान मिलने की मान्यता है। यहां राजिम तेलिन (राजीव भक्तिन माता) जैसी भक्तों की कथाएं प्रेरणा देती हैं, जिन्हें मोक्ष प्राप्त हुआ।
पापों से मुक्ति और मोक्ष प्राप्ति: त्रिवेणी संगम (महानदी, पैरी, सोंढुर) पर स्नान + मंदिर दर्शन से पाप नाश और आत्मिक शुद्धि होती है। यह स्थान कमलक्षेत्र या हरिहर क्षेत्र कहलाता है, जहां सृष्टि की शुरुआत से जुड़ी कथाएं हैं—इसलिए दर्शन से आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति का विश्वास है।
तीन रूपों के दर्शन से विशेष फल:-
सुबह — बाल्यावस्था (बाल रूप) के दर्शन से बुद्धि और स्वास्थ्य में वृद्धि।
दोपहर — युवावस्था के दर्शन से सफलता और ऊर्जा।
रात — वृद्धावस्था के दर्शन से शांति और दीर्घायु। यह अनोखी विशेषता यहां की है, जो भक्तों को अलग-अलग समय पर अलग लाभ देती है।
कष्ट निवारण और शांति: भगवान के चतुर्भुजी स्वरूप (शंख, चक्र, गदा, पद्म) के दर्शन से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, मानसिक शांति मिलती है, और परिवार की रक्षा होती है। शनिवार को विशेष पूजा और तिल के तेल से लेपन से शनि दोष से राहत मिलने की मान्यता है।
कुंभ मेला में विशेष लाभ: माघ पूर्णिमा से महाशिवरात्रि तक लगने वाले राजिम कुंभ (छत्तीसगढ़ का प्रयाग कुंभ) में दर्शन से असीम पुण्य और सभी प्रकार के संकटों से मुक्ति मिलती है। लाखों श्रद्धालु यहां स्नान-दर्शन कर आशीर्वाद लेते हैं।
आध्यात्मिक महत्व
यह मंदिर नागर शैली का प्राचीन है (7वीं-8वीं शताब्दी), जहां विष्णु के विभिन्न अवतार (वराह, नृसिंह, वामन, बद्री) के दर्शन भी होते हैं। कुलेश्वर महादेव (संगम के बीच) के साथ मिलकर विष्णु-शिव दोनों का आशीर्वाद मिलता है।
रायपुर से इतना करीब (करीब 45-50 किमी) होने से आप आसानी से जा सकते हैं। सच्ची श्रद्धा से दर्शन करने पर भक्तों को शांति, सकारात्मक ऊर्जा और जीवन में सकारात्मक बदलाव महसूस होता है।
उक्ताशय की जानकारी A I से लिया गया है।
